Sunday, March 29, 2015

एक तस्वीर

बैठक की दीवार पर टंगी तस्वीर को
आज बड़े जतन से उतारा था
शक़्ल-ओ-सूरत कुछ गंदली हो चली थी
झाड़-पोंछ करनी थी
ख़ैर-ओ-ख़ैरियत जाननी थी
यूँ तो नीचे करीने से लगे
हर एक असबाब पर
ग़र्द के निशाँ तक न थे
बेतरतीबी जैसे कहीं छूकर भी न गयी थी
बस ये एक तस्वीर तन्हाँ और महरूम
अपनी जगह पर काबिज़
जाने मुद्दतों से किसको एकटक
देखती रहती थी
नीचे उतारकर उसको,
दराज़ में दबे कहीं
यादों के सफ़ेद रुमाल से 
'उसकी' सूरत बदल दी
हाथ फ़ेरा तो
रंग हाथों पर बेबस उतर आये
जैसे बीते तमाम बरस 'उसके'
अनसुने और बेज़ार गुज़रे थे
आज सारी हसरतें जैसे
कुछ कहने को थीं,
गुज़रे वक़्तों में कितनी नज़रों से
उसने तारीफ़ें तस्लीम की थीं
पर एवज में बस एक मुस्कान
और फ़िर से वही ख़ामोशी,
बैठक में जब चहल-पहल होती
मेहमान आते
घण्टों फ़िर से 'उसपर' बातें होतीं
दाद दी जाती
पर महज़ फ़ासलों ही से,
आज ये फ़िक्रमंदी का छुअन
जाने क्यों सारे एहसासों को
नयी ज़िन्दगी दिए जाता है
कितने अरसे बाद
किसी ने शायद रंगों की सदा सुनी है

Sunday, January 04, 2015

A Puffy Monologue!

Picture Courtesy: Google 


Amidst those reverberations
of withered hopes
She croons
a melody repeatedly
tragic spell embraces
the misty eventide
to the horizons
no one is there
but those icy breaths
frozen love and
molten compassion
perches on a solitary bench
He musters all the might
utters few words
floating on the vitreous lake of heart
she is all ears
but refrains
he tries to decipher
the codes of puffs
alas! they (puffs) don't last long
and these wintry evenings neither
she evanesces then,
he melts.

Sunday, December 14, 2014

सर्द एहसास!




दीवार पर घड़ी की टिक-टिक
अब आग़ोश में ले लेती है
छत पर टंगे पंखे के डैनों की आवाज़ को
ख़ामोशी जैसे ऐसी सौगात हो
जिसे रात नज़्र करके गई हो
खिड़कियों पर परदे हिलते हैं
तो जिस्म सिहर जाता है
बाहर सर्द हवाओं ने दस्तक दी है
मौसम ने फ़िर से करवट ली है शायद,
सारी तपिश जैसे कलम ने ज़ब्त कर लिया हो
स्याही से सफ़्हे सुलगते से हैं
असर तल्ख़ सा होने लग जाता है सुखन का
लोग मानिंद धूप के आते हैं
हरारत भी साथ लाते, पर
एक हिस्सा मेरा फ़िर भी गलन में
तिल-तिल कर दम तोड़ता
काश! तुम कुहरे के चादरों तले सिमटे
मेरे बेहाल,बेज़ार हर्फ़ पढ़ते
काश! तुम उस हिस्से को
मुकम्मल सी एक ज़िन्दगी देते

Tuesday, December 09, 2014

दीदी !


स्कूल जाते हुए वही
कश्मकश होती कि
ये यूनीफॉर्म क्यों?
'दीदी' झट से ये यक्ष-प्रश्न
काफ़ूर कर देती
इस्तरी करके करीने से रखी
शर्ट और पैंट ले आती
बस फ़िर क्या था
दो पल में नन्हा सा जेन्टलमैन कर देती
गालों को एक हाथ से पकड़
दूसरे से बालों पर कंघा फिराती
मैं गुस्से में तिलमिलाता
दीदी! मैं कोई बच्चा नहीं अब
पर कहाँ चलती मेरी
स्वीकारोक्ति में बाल सँवर जाते
अच्छा चलो पैर आगे करो
मैं मुँह बनाकर जूते की डोरी बँधवाता
फ़िर शुरू होता
खाना खाने का ताण्डव
दीदी हर निवाले के साथ
हिदायतों की घुट्टी देती
टिफ़िन चुक जानी चाहिए
वापस आकर पूरी जाँच टिफ़िन की होती
बड़ा हुआ स्कूल छूटा
और ये नित्य का क्रम भी टूटा
पहले कॉलेज और फ़िर
अब नौकरी की जद्दोज़हद
अब बालों में कंघा फ़िरता तो है
पर वो मासूमियत नहीं आती
जो दीदी लाती थी
जूतों की डोरियाँ तो बंध जाती हैं
पैर संभल भी जाते हैं
पर वो स्नेहिल झरोखे खुले ही रहते हैं
इस आस में की दीदी सब हिस्से
समेट के बाँध देगी
जो बिखरे से रहते हैं
वक़्ती तक़ाज़ों ने निक्कर से
सूट तक ला खड़ा किया
पर अब भी मैं उसका 'बाबू' हूँ
जो बस्ता लादे कल स्कूल के सबक सीखता था
काँधों पे बोझ आज भी है
पर आज शायद ज़िन्दगी पढ़ता है । 


Sunday, December 07, 2014

जीवन : एक दृष्टिकोण


मलिन व मृतप्राय होते वस्त्र सही
पर जीवन और जिजीविषा का अद्भुत स्वरुप
दिन-प्रतिदिन सूरज से संघर्ष होता
तीखे निर्मम प्रकाश से होड़ रहता
अंग-प्रत्यंग दुखाकर तब कहीं
वरदान स्वरुप दो निवाले आते
यहाँ मरू में मरीचिका की आस नहीं
उपवन में जीवन का सुहृद प्रयास है
परिस्थितियाँ मौन कराती परन्तु
हर साँझ अलाव पर बैठकर
उसके ठहाके और गुंजित होते
पौरुष से अर्जित दो सूखी रोटियों
और कुएँ के एक लोटे पानी में बड़ा प्रताप था
क्षुधा तृप्त हो जाती
नभ के असीम चादरों में बस
आनंद सोता होनी-अनहोनी से निर्लिप्त
रजनी एकटक देखती हतप्रभ सी
कि ये कैसा सन्तोष है
कैसी तृप्ति है
और वत्सल हाथों से सर पर हाथ फेरती
वह झट निद्रा को विजित कर लेता
चिंता की रेखाएँ होतीं पर
वह अद्भुत तृप्ति उन्हें जाने कहाँ मिटा देती
अहा! क्या जीवन है उसका
और हम ?
अर्थ के फाँस में बँधने की युक्ति
और प्राप्ति हेतु जीवन भी विस्मृत करना
क्या तुच्छ उद्देश्य हमारे थे
लालसा उसको भी है ऐश्वर्य की
पर नियति ने परिभाषा और दी है
दुःख-कंटकों के घाव असंख्य होते
आँसुओं में सिक्त अनेकों आशाएँ भी होतीं
पर क्षण-क्षण का उल्लास विह्वल करता
तम सा प्रशस्त अन्धकार क्यों न घर में पर
ह्रदय का ओज अप्रतिम रहता
विपन्नता और अभाव लघुता से कम्पित करते
'जिजीविषा' से अपने वह पर सदा अडिग रहता
यही गुरुता है जीवन की 
यही सारांश है जीवन का । 





Monday, December 01, 2014

एक क़तरा : ज़िन्दगी

Picture Courtesy : Google  



                      
ज़िन्दगी
शबनम के शफ़्फ़ाफ़ क़तरे सी
किसी सुबह एक ज़र्द पत्ते पर
यूँ सर रखे कुछ नासाज़ मिली
शायद अर्श से फ़र्श तक के
सफ़र और रास्तों से ख़ाइफ़ थी
जिस्म तप रहा था
आँखें बेसबब बन्द हुई जाती थीं
सब पिछले वाक़यात सिलसिलेवार
किसी किताब के पन्नों के मानिंद
ज़हन पर दस्तक देने लगे
मानो जैसे हश्र का दिन हो
कुछ कहे पर मलाल
कुछ अनकहे पर सवाल
हालातों से हलकान कभी
ख़ुशियों पर इत्मिनान भी कभी
गाहे-बगाहे पाकीज़गी की आज़माईश भी
ख़ुद को खोने-पाने की गुँजाइश भी थी
तभी एक सफ़हे पे निगाह थमी
वो मुड़ा-तुड़ा सा ज़रूर था
हर्फ़ भी जैसे बेतरतीब बिखरे पड़े
किन्हीं ज़हनसीब हाथों के लम्स को
उम्र भर के तरसे हुए थे
शायद कोई क़रीब आते-आते
फ़ासलों में गुम हुआ था
तभी महक अब तलक उन्हीं
सफ़्हों में क़ैद है
ख़ैर,ये कारवाँ कब रुके हैं
जो तब रुकते
एक अन्जाम तो लाज़मी था
वही जो कभी फ़िज़ाओं की शोख़ी से
लरजते पत्तों पर खिलखिलाती बूँदें
वही जो आज ज़मीं पे ज़र्द पड़े
पत्ते पे बेज़ुबान पर शायद सुक़ूँमंद बूँदें
यही तो तक़्मील उस बूँद की थी
फ़लक के अब्र से ज़मीं की तहों तक

Tuesday, July 29, 2014

Tulika..

Applying that wet handkerchief on the forehead, i tended to plunge into the past, involuntarily.
"Vivek, for god sake! just stop behaving like a little kid!"
Please, take medicines and go to sleep, honey!

Hell no, I'm not gonna take any damn medicine anymore, that's all. You have no freaking idea but you are nothing short of a panacea to me. How on earth these so called medicines will cure me then (with a teasing wink).
Gosh! You are blazing like anything with 104 degrees, still can't you stop letting out your tricky cheesy lines? (with love soaked anger).
You know it very well my sweetie-pie, that I can't help it.
(Grinning devilishly).
See, the mighty pen of a poet, running blood into the veins and brimming romanticism within me can never be restrained. They only can if...........!
Shut up! you never think of, what to say, don't you? She just stopped me to utter anymore putting her fingers on my lips.
Tulika!
hmmm.... (with teary eyes)
I wanna say something..
Yeah, please..
If you were not in my life, I could never imagine those tears as valuable as pearls and those blisses as stars.At times I wish this fever not to come to end, my forehead remains on fire, then your loving aroma of being around and your silky hands on my forehead inculcates those myriad reasons within me to weave those loveful verses.
Oh! got you..those poems are more important to you than my love and care,aren't they? Huh..!
No way! with a teasing smile, he said.
The thing is, it's you who makes my beat skip and that birdies of my heart fly to the horizons just to pick those glitters and die to tag them onto your immaculate attire. This is how poem sprouts by its own, I do nothing darling! So, now do you believe these poetry of mine is nothing but the embodiment of your being. Don't you?
Oh God! you know, you are just impossible. (blushing helplessly)
Whose hubby i am, after all.(winks)
With the trailing off,she was into my arms, He, then realized how one can complete one's whole world with this loving gesture.

Tulika! Tulika! .........!
Voice weakens and reality bumps in, ruthlessly.
She is not gonna respond you vivek, go sleep. He murmured and starts peeping through the window..
9 years..
it's been 9 long years when her giggles used to reverberate through each and every corner of this house and how did this time limit it merely to my heart now.
Sigh..!!!
Sipping the coffee he keeps on pondering..
Instead of sharing my life with anyone else after the departure of her, I decided to live it all alone, whatever it took so far, Who cares.
'Tulika' is no more in my life today, but under that Gulmohar tree that is standing still in that corner of the park,at the bus stop nearby my place, in those teary and blissful letters, with every single cup of tea in the mornings, at the dinner table of every night, in every single folds of my bed and above of all these, she is more than lively and alive everywhere in my soul.
When it was around, didn't make me feel incomplete even in my dreams and they say she is not there anymore still I feel so complete with that eternal love.

Saturday, July 26, 2014

एक ग़ज़ल..

सफ़्हे सुकून-ए-रूह, जिस्म हाशिया हुआ
ग़ज़लों में भी तुम्हारा ग़ैर का न मैं हुआ

हर क़दम पर थी रंजिश,सितम सफ़र भर रहा
दिए को तमाम उम्र जलाती रही दुआ 

फूलों को न बख़्शा जहाँ कलियों को भी मसला
गुलशन का हमनफ़स कोई गुलफ़ाम न हुआ

जब भी मिला साहिल से अन्दाज़ और था
आब-ए-रवाँ का अपना कोई ताउम्र न हुआ

दिन हश्र के भी यूँ सर धुन रहे हो अब
मिल गया है ग़र जवाब फ़िर सवाल क्या हुआ

बदल जाने को अब 'विवेक' रवायत ही जान लो
साया भी सर-ए-राह मुस्तक़िल नहीं हुआ

Sunday, July 20, 2014

Moon Shines Again!

  



                                                             Feeble Moon blazed                               
                                                             with a everlasting twinge                       
                                                             few unsaid words echoed!
                                                             I was left with a volatile dream
                                                             and a perennial longing
                                                             When I plunged into 
                                                             that fascinating night
                                                             But you cropped up
                                                             out of nowhere
                                                             with angelic charm
                                                             and elfin grace
                                                             and revived my 
                                                             glimmering hopes again..
 

Sunday, June 22, 2014

कोई बात अब चले..


सेहरा हो ग़ुलशन हो 
सितारों का बज़्म हो 
दूर ख़यालातों से परे कहीं एक रिश्ता तो पले 
कोई बात अब चले,

एक आस कभी टूटे 
कोई पास होकर रूठे 
कश्मकश में उलझे धागों का कोई छोर तो मिले 
कोई बात अब चले,

न सोज़-ए-दिल से धुआँ उठे 
न अरमाँ बेबस जले 
तबीब बनकर चाक जिगर के कोई अब तो सिले 
कोई बात अब चले,

ख़िज़ा का वार ख़ाली हो 
दुआ देता हुआ वो माली हो 
चमन में आरज़ूओं के कोई फूल तो खिले 
कोई बात अब चले ।