Sunday, June 22, 2014

कोई बात अब चले..


सेहरा हो ग़ुलशन हो 
सितारों का बज़्म हो 
दूर ख़यालातों से परे कहीं एक रिश्ता तो पले 
कोई बात अब चले,

एक आस कभी टूटे 
कोई पास होकर रूठे 
कश्मकश में उलझे धागों का कोई छोर तो मिले 
कोई बात अब चले,

न सोज़-ए-दिल से धुआँ उठे 
न अरमाँ बेबस जले 
तबीब बनकर चाक जिगर के कोई अब तो सिले 
कोई बात अब चले,

ख़िज़ा का वार ख़ाली हो 
दुआ देता हुआ वो माली हो 
चमन में आरज़ूओं के कोई फूल तो खिले 
कोई बात अब चले । 


Friday, April 04, 2014

एक ग़ज़ल

मकाँ का हश्र देखकर कैफ़ियत समझ लिया 
वो कहते हैं दीवार-ओ-दर तो यूँ बेज़ुबान है 

तुमपर हया की बन्दिश, मैं फ़ितरत का मारा हूँ 
कुछ ऐसी अपने इश्क़ की ये दास्तान है 

कभी ज़िल्लत कभी शोहरत कभी नेकी कभी बदी 
हर एक शख्स यहाँ खुद में कहीं परेशान है 

एक रिहायशी बस्ती थी कभी अपनों के शहर में 
किसी रक़ीब का भी अब जहाँ न नाम-ओ-निशान है 

इन मख़मली असाईशों की तुमको बेकली मुबारक हो 
हमें सुकूँ की चादरों तले ही इत्मिनान है 

निगाह-ओ-दिल से गुजरेंगे वही काग़ज़ पर बिखरेंगे 
मैं शायर हूँ मेरी तहरीर का एक ईमान है । 

Saturday, March 08, 2014

'औरत'




कभी रग़-ए-ख़ून 
कभी क़तरा-ए-अश्क 
कभी मुस्कुराहटों की हसीं तासीर है 'औरत'

कभी हिजाबों की रौनक़ 
कभी हया की शोख़ी 
कभी ज़लज़लों से दो-चार होती शमशीर है 'औरत'

कभी जद्दोज़हद की आँधी 
कभी समन्दरों का सुकून 
कभी सियाह अब्रों पे खिंचती चाँदी की लकीर है 'औरत'

कभी बादा-ए-इश्क़ 
कभी नग़मा-ए-वफ़ा 
कभी ग़ज़लों की बेइंतहाँ पीर है 'औरत'

कभी रानाई कुदरत की 
कभी रोशनी चिरागों की 
कभी तर्जुमों से परे होती बेनज़ीर है 'औरत'

कभी आबरू की मिसाल 
कभी तहज़ीबों का आईना 
कभी मुर्दा इन्सानियत को जगा दे वो ज़मीर है 'औरत' 

कभी ख़लाओं की हसरत 
कभी दुआओं का करिश्मा 
कभी मुफ़लिसी में साथ देती कोई हीर है 'औरत'

कभी कुछ अनकहे मिसरे 
कभी दम भरते अशार 
कभी शायरों के दिलों में धड़कती तहरीर है 'औरत'

Sunday, February 02, 2014

एक सवाल

क़तरा अश्क़ का आँखों से बग़ावत सा कर गया 
तेरी पनाहों में महफ़ूज़ हूँ तो बहाता क्यूँ है 

मक़बूल करके बेनियाज़ी तमाम सालों की 
अब हर लम्हे में उसी काफ़िर को सजाता क्यूँ है 

सितम तूने दिए इतने कि बदन ख़ाक हो गया 
आतिश-ए-इश्क़ से उन्हें फ़िर तू  जलाता क्यूँ है 

बड़ा बेपीर और संगदिल रहा है हमदम मेरा 
खुली बाँहों से तू  फ़िर इश्क़ लुटाता क्यूँ है 

कमनसीबी मेरी या कि लकीरों का ऐब है 
सदाएँ दे कर उन्हें फ़िर भी बुलाता क्यूँ है 

सुकूँ का सफ़ीना बहा तो बहता चला गया 
हर एक मौज को ज़िन्दगी तू बताता क्यूँ है 

जहाँ इंसानों का तसव्वुर फ़िज़ूल है 
वहाँ फ़रिश्तों को तू ज़हन में लाता क्यूँ है 

मुमकिन नहीं दिखता हाल-ए-दिल का बयाँ अब 
कभी लबों कभी लफ़्ज़ों को फ़िर आज़माता क्यूँ है 

अन्दाज़-ए-बयाँ औरों से मुख्तलिफ़ है ज़रा सा 
फ़िर रोशनी में 'विवेक' तू आता क्यूँ है । 

Sunday, January 19, 2014

एक ग़ज़ल


गुफ़्तगू में अब मैं जिरहों से परहेज़ करता हूँ 
ख़त्म होने के बाद कम्बख्त बहुत याद आते हैं 

भरे महफ़िल में उनकी रुस्वाई नागवार जाती है 
लोग फ़ब्तियां कसते तन्ज़ बरसा के जाते हैं 

क़ुर्बतें सिसकती हैं जब रिश्ते तल्ख़ होते हैं 
उल्फ़तों में फ़ासलों के ज़िक्र आ ही जाते हैं 

माँ जैसा कोई जहाँ में ढूँढना फ़िज़ूल है 
ग़मगीनियत में तोलो जो और रिश्तों में आते हैं 

काफ़िये को ढील दी तो यूँ ग़ज़लें मचल गईं 
तहरीरों से शाद दिल को वो फ़िर  दुखा के जाते हैं 

तमाम बस्तियों के तंग कूचों से यूँ गुरेज़ नहीं है 
तंगदिली से ज़हन-ओ-दिल पर वो सितम ढा ही जाते हैं 

ख़ानाबदोश दिल की वो आवारा उलझनें 
सिलसिलेवार उनके ख्वाब सब सुलझा के जाते हैं 

तुम मुझसे छुपाते हो अपने दिल के ज़ख़्म 
कभी ग़ज़लों कभी नग़मों से वो नज़र आ ही जाते हैं 

ऐ मेरे सोज़ तू कोई और आशियाँ तलाश ले 
वो अब दिल में ही रहेंगे जो ख्वाबों में आकर जाते हैं । 

Sunday, September 01, 2013

एक ग़ज़ल



आज भी वफ़ा को सीने में दबाए हम 
मोहब्बत का पुरसुकून सितम माँगते हैं | 

जिस्म जला रूह जली ख़्वाब जल गए 
मुफ़लिसी में अब एक नज़र-ए-करम माँगते हैं | 

लोग बेपरवाह थे सर-ए-बाज़ार में हबीब 
चन्द रातों में तुम्हारे हिज्र की जलन माँगते हैं | 

तुमने बेरुख़ी के सिवाय कुछ भी नहीं दिया 
बेख़ुदी में डूबा फ़िर भी दीवानापन माँगते हैं | 

तन्हाई में अब दिल के वो साज़ नहीं छिड़ते 
नज़्मों ग़ज़लों से रोशन वही अन्जुमन माँगते हैं | 

जहाँ के मखमली लिबासों में कोई जँचता ही नहीं अब 
हिजाब से सजा तुम्हारा रुख़ पे  पैरहन माँगते हैं | 

ऐसा नहीं कि कोई चेहरा निगाहों से नहीं गुज़रा 
हसीं शोख़ी से लबरेज़ वही बाँकपन माँगते हैं | 









Tuesday, June 11, 2013

एक हादसा..!!


                                      कल रात छत पर
                                      फलक की जानिब
                                      टकटकी बाँधे
                                      सियाह चादरों तले
                                      सितारों का खेल देखा
                                      कुछ मद्धिम कुछ उजले
                                      कुछ सर उठाए कुछ कुचले
                                      सब अपनी रोशनी में
                                      छुपे अंधेरों पर
                                      रोते-बिलखते से दिखे
                                      जब शायर ने
                                      किसी नाज़नीं के निगाहों
                                      को सितारा लिखा था
                                      सारे कैसे एक साथ
                                      मुस्कुराए थे,
                                      तभी अचानक
                                      एक हादसा हुआ
                                      हाँ, हादसा ही तो था
                                      धू-धू कर मेरे अरमान जले थे
                                      ख्वाबोँ का बेरहम क़त्ल हुआ था
                                      चाँद पर भी शायद खून सवार था
                                      तभी एक सितारा दूर कहीं
                                      मेरे नाम का टूटा था
                                     और
                                     सभी ने सोचा
                                     कोई दुआ क़ुबूल हुई ।

Saturday, June 01, 2013

ख़ामोश मेहरम..!!





कुछ बोलो मत
ख़ामोशी को यूँ रग़ों में
बेपरवाह बहने दो,
बहने दो कि जब तक
क़तरे-क़तरे का जुनून
हर एक नब्ज़ पर काबिज़ है
मैं लबों से फूटे कुछ हर्फ़ों के बजाय
तुम्हारे रूह के तिलिस्म को
तोड़ना चाहता हूँ
खोलना चाहता हूँ
उन तमाम गिरहों को
जो हमारे दर्मियान साँस लेते हैं
भीगना चाहता हूँ
उन बेमौसम बारिशों में
जो क़ुदरत को भी बेमानी कर दें
डूबना चाहता हूँ
उस रोशनी में
जो मेरी बेज़ुबान रातों का नूर है
फ़ासलों के एहसास से
इसे सुफ़ैद रहने दो
एक अल्फाज़ भी निकला
तो रिश्ता मैला हो जाएगा
कुछ बोलो मत
तुम लहर दर लहर
यूँ बढ़ती जाओ
मैं बूँद बूँद घुलकर
उन निशानों पर बहूँगा
जो कभी तुम्हारे थे
तुम कुछ बोलो मत
कुछ मत बोलो ।

Friday, May 03, 2013

एक नज़्म


कतार में खड़ी शामें
उफ़क़ के परे कहीं पिघलती हुई
अपने मायनों की तलाश में
डूबती सी हैं ,
जब हाशिए पर खड़ा मैं
हर्फों पर पेबंद लगा
नज़्मों के लिबास पर
ज़रा इतरा सा जाता हूँ
पर आज जब दरीचे खोले
तो आँखें भिंची रह गयी
 रुख फ़लक के जानिब था
और वो पेबंद बर्फ़ की तरह साफ़
और सितारे की तरह रोशन दिखे
नज़्म को कई बार टटोला
और कलम के तर्जुमें में तोला भी
तब एक टीस उठी
कि कोई आह ना जुम्बिश
मेरी नज्में सिसकती क्यों हैं  ।

Sunday, April 28, 2013

एक मौत


आज ख़यालों के पतवार से
उस सफ़ीने को जब
समन्दर के आग़ोश में उतारा
तो दूर कहीं ढलती शाम के
अक्स में ख़ुद का ही
एक ज़र्द बेबस चेहरा
थमती नब्ज़ों पर
कहीं टकटकी लगाए
गुमसुम सा बैठा था ,
कब तक कुछ बेजान थपकियों भर से
उसकी रंगत सहेजता ,
क़तरा-क़तरा साँस-साँस
एक नूर मद्धिम सी होती जान पड़ती है
अब जब ज़िन्दगी मुझ पर
फ़िकरे कसती
मेरा मखौल उड़ाती है
तब एक मुकम्मल एहसास होता है
कैसे एक संजीदा ख़याल
दम तोड़ता है
और मैं इस 'मौत' का
तमाशबीं खुद होता हूँ ।